बेवजह की खरीददारी भी है एक तरह की बीमारी, जानें इसकी वजहें, लक्षण और उपचार


बेवजह की खरीददारी भी है एक तरह की बीमारी, जानें इसकी वजहें, लक्षण और उपचार

उत्साह में आकर बिना सोचे-समझे शॉपिंग करना और बाद में पछताना अगर आपकी आदत का हिस्सा बनता जा रहा है तो यह कंपल्सिव बाइंग डिसॉर्डर हो सकता है। क्या है यह कैसे पहचानें इसे जानें यहां

हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं जो उत्साहित होकर शॉपिंग करते हैं और उन्हें इस बात का एहसास तक नहीं होता कि अपनी इस आदत पर वे कितना समय, श्रम और पैसा बर्बाद कर रहे हैं। दरअसल, किसी तरह की चिंता से ग्रस्त इन लोगों के लिए शॉपिंग स्ट्रेस बस्टर बन जाती है और शॉपिंग न कर पाने पर नकारात्मक भावनाएं घेर लेती हैं।

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1. कंपल्सिव बायर ज़्यादातर कपड़े, जूते-चप्पल, ज्यूलरी और घर की ज़रूरत के सामान जैसे बर्तन, कंटनेर आदि खरीदते हैं। 

2. इन्हें जगह-जगह लगी सेल देखने में बहुत मज़ा आता है और चाहते हुए भी यह सेल से खरीददारी करने से खुद को रोक नहीं पाते।

3. कंपल्सिव बायर किसी के साथ शॉपिंग करना पसंद नहीं करते। ज़्यादातर शॉपिंग अकेले या ऑनलाइन ही करते हैं।

4. पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों में कंपल्सिव बाइंग डिसॉर्डर की समस्या ज़्यादा पाई जाती है।

5. क्रयशक्ति और संपन्नता बढऩे के साथ कई ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के आने से इस प्रवृत्ति में इज़ाफा हुआ है।क्या है यह स्थिति

ज़्यादा शॉपिंग करना एक तरह का डिसॉर्डर माना जाता है, जिसे मेडिकल की दुनिया में कंपल्सिव बाइंग डिसॉर्डर कहते हैं। दुनिया में बहुत से लोग इसके शिकार रहते हैं लेकिन वे इसे पहचान नहीं पाते।

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क्या हैं इसके लक्षण

1. किसी चीज़ को किसी भी कीमत पर पाने की इच्छा।

2. आवेश या जोश में खरीददारी करना और बिना ज़रूरत के भी बहुत-सी चीज़ें खरीदना।

3. कुछ भी खरीदते समय अचानक उत्साह और खुशी से भर जाना।  

4. बिना सोचे-समझे सामान खरीदने के बाद दर्द या पछतावा होना।

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5. अधिक खरीददारी की वजह से अर्थिक दिक्कतों में फंसना और तनावग्रस्त होना।

6. तनाव की वजह से कभी-कभी अशिष्ट व्यवहार करना। कलीग्स, परिवार और आसपास के लोगों से अनबन होना।

उपचार

यह व्यवहार से जुड़ी एक समस्या है। खुद में थोड़े से बदलाव लाकर भी इस स्थिति पर काबू पाया जा सकता है। व्यक्ति को खुद में इस तरह के बदलाव लाने चाहिएः- 

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1. तनाव और अकेलेपन से दूर रहने की कोशिश करें।

2. जीवन में विविधता तलाशें। अलग-अलग तरह के कामों में खुद को व्यस्त करें।

3. परिवार और करीबी दोस्तों के साथ घूमने जाएं।

4. मनपसंद फिल्में देखें और किताबें पढ़ें। 

5. व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। मन पर नियंत्रण पाने की कोशिश करें।

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6. खुद में बदलाव न लाने के बावज़ूद अगर स्थिति में सुधार न दिखे तो किसी एक्सपर्ट से संपर्क करेंं।

डॉ. प्रकृति पोद्दार (मनोवैज्ञानिक सलाहकार)

 

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