छोटी-छोटी एलर्जी भी हो सकती है खतरनाक, जानें इसकी वजहें और सही इलाज


छोटी-छोटी एलर्जी भी हो सकती है खतरनाक, जानें इसकी वजहें और सही इलाज

अस्थमा की पहली सीढ़ी कही जाने वाली कई तरह की एलर्जी में कहीं आप भी तो किसी एक एलर्जी का शिकार नहीं। जरूरी है इसके पीछे की वजहों को जानकर उसकी रोकथाम और इलाज करना।

धूल के कण, प्रदूषण, अगरबत्ती या फिर पालतू पशु का संपर्क आपको सांस लेने में दिक्कत पैदा करता है तो यकीन मानिए कि आप 200 तरह की एलर्जी में से किसी एक एलर्जी के शिकार हो चुके हैं, जिसको नजरअंदाज करना भविष्य में अस्थमा का कारण बन सकता है। अस्थमा या सांस की बीमारी यानी सीओपीडी के लिए अगर केवल आप बाहरी प्रदूषण को ही जिम्मेदार मानते हैं तो एक बार फिर अपनी जानकारी को दुरुस्त कर लीजिए, केवल बाहरी प्रदूषण ही नहीं घर के अंदर की कुछ छोटी-छोटी चीजें भी हमें अस्थमा के करीब ले जा रही हैं, जिन पर अक्सर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। अस्थमा की पहली सीढ़ी कहलाई जाने वाली कई तरह की एलर्जी में आप भी किसी एक एलर्जी के शिकार हो सकते हैं। इससे बचने के लिए जिम्मेदार कारकों को जानने के साथ ही सही समय पर सतर्क होना भी जरूरी है। 

कहीं क्वॉयल तो नहीं कर रहा बीमार

घर को सुगंधित और मच्छरों से बचाव के लिए हम कई तरह की क्वॉयल, स्प्रे और अगरबत्ती का प्रयोग करते हैं। इससे मच्छर तो दूर हो जाते हैं लेकिन लंबे समय तक इस धुंए का संपर्क फेफड़ों को बीमार कर रहा होता है। इंडियन जर्नल ऑफ एलर्जी, अस्थमा और इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार, घरों में धूप अगरबत्ती, क्वॉयल व स्प्रे का प्रयोग पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) दस और 2.5 के स्तर को तीन से चार गुना बढ़ा देता है। हवा में प्रदूषण के कण पीएम दस और पीएम 2.4 के स्तर को नापने के लिए पोर्टेबल लेजर एयरोसॉल स्पेक्टोमीटर और डस्ट मॉनिटर नामक उपकरण का प्रयोग किया गया। धूप, अगरबत्ती (फ्लोरा), मच्छर रोधी क्वॉयल, अगरबत्ती (चंदन) को जलाने से पहले, जलने के दौरान और जलने के बाद के पीएम दस और पीएम 2.5 को जांचा गया। धूप जलने से पहले पीएम दस जहां 125.1 था, धूप जलाने के दौरान इसका स्तर 177.5 और जलने के बाद 459.9 देखा गया। वहीं मच्छररोधी क्वॉयल जलने के बाद पीएम दस का स्तर 120.1 से 153.5 तक पहुंच गया। क्वॉयल या अगरबत्ती के इस्तेमाल के बाद इसका सीधा असर सूखी खांसी के रूप में देखा जाता है लेकिन ज्यादातर लोग इस प्रभाव का नजर अंदाज करते हैं।

 

कहीं दमघोंटू तो नहीं आपका घर?

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धूप, अगरबत्ती और क्वॉयल के अलावा घर में सुविधा के लिए जुटाए गए अन्य इलेक्ट्रॉनिक और रेडिएशन युक्त उपकरण भी घर की शुद्ध हवा को चुपके से खींच लेते हैं। माइक्रोवेव ओवन, फ्रिज से निकलने वाली हवा, पेंट वार्निश जैसी कई चीजें घर में शुद्ध हवा के अनुपात को कम करती हैं। जरूरत की इन चीजों का प्रयोग न हो यह तो संभव नहीं, लेकिन बेहतर होगा कि घर में वेंटिलेशन (हवा का पर्याप्त होना) का पूरा ध्यान रखा जाए। पूजा घर में अगर धूप या अगरबत्ती जल रही तो पास में ऐसा झरोखा या खिड़की जरूर होनी चाहिए, जिसके जरिए दूषित हवा बाहर निकल जाएं। शहरों और सोसायटी के घरों में इसके लिए एक्जॉस्ट फैन और आधुनिक चिमनी का इस्तेमाल किया जाता है। जहां तक मच्छरों से बचने की बात है, तो इसके लिए अन्य सुरक्षित विकल्प इस्तेमाल किए जा सकते हैं, इसी तरह धूप अगरबत्ती की जगह केवल दीपक भी जलाया जा सकता है। किचन में यदि माइक्रोवेव या ओवन का प्रयोग हर रहे हैं तो चिमनी जरूरी लगवाएं, जिससे दूषित हवा तुरंत बाहर निकल जाएं। एक्जॉस्ट पंखे का प्रयोग भी सुरक्षित हो सकता है।

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कैसे होती है एलर्जी की जांच?

80 प्रमुख तरह की एलर्जी के एंटीजन की जांच पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट में होती है। केवल अधिक खुशूब जैसे परफ्यूम या इत्र और बदबू जैसे गैस लीकेज से होने वाली जांच का एंटीजन नहीं खोजा जा सका है। बच्चों में फूड एलर्जी की जांच खून के आइजीई एंटीजन से पता लगाई जा सकती है। स्किन सेंसिविटी एयरोएलर्जिन इन इंडिया के तहत किए गए अध्ययन में लोगों में 150 से 200 तरह की एलर्जी देखी गई। स्किन प्रिक टेस्ट से भी एलर्जी के एंटीजन से एलर्जी का पता लगाया जा सकता है। महानगरों में प्रमुख 20 तरह की एलर्जी के एंटीजन ही प्रयोग में लाए जाते हैं।

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प्राणायाम और अनुलोम विलोम है लाभदायक

समस्या है तो समाधान भी है। सांस की किसी भी तरह की तकलीफ से बचने लिए योग और व्यायाम को बेहतर माना गया है। नियमित प्राणायाम करने से फेफड़ों में शुद्ध हवा पहुंचती है। इसके साथ ही इससे श्र्वास नली में संकुचन की संभावना भी दूर होती है। अब तक किए गए अधिकांश शोध में देखा गया कि नियमित प्राणायाम और अनुलोम विलोम से श्र्वसन क्रिया मजबूत होती है। सुबह हरी घास पर नंगे पांव चलना, मॉर्निग वॉक और प्रिजर्वेटिव फूड (जैसे-जैम, जैली, सॉस और सिरका) से दूर रहने से भी सांस संबंधी तकलीफ से बचा जा सकता है। श्र्वसन क्रिया को बेहतर करने के लिए की जाने वाली जलनेति क्रिया भी फेफड़ों को दुरूस्त करने के लिए बेहतर मानी गई है।

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एलर्जी से बचने के आसान उपाय

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1. सुबह टहलने की आदत डालें। सुबह की हवा में दस मिनट की गहरी सांस अंदर लें और नाक के जरिए ही बाहर छोड़ें।

2. सिगरेट, हुक्का या ऐसे किसी भी धूमपान का सेवन न करें। इससे सांस की बीमारी का खतरा बढ़ता है।

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3. संरक्षित खाद्य पदार्थो के सेवन से परहेज करें। फाइबर युक्त भोजन करें।

4. जलनेति का अभ्यास करें। यह श्र्वास नली को बेहतर करती है।

5. एलर्जी ट्रिगर या कारक चीजों जैसे धूप, अगरबत्ती, परफ्यूम, पोलन डस्ट, वार्निश, पेंट आदि से दूर रहें।

6. स्किन प्रिक जांच में अगर आप किसी एक भी एलर्जी के एंटीजन पॉजिटव है तो सावधानी बरतें।

(डॉ. राजकुमार, निदेशक, पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट, दिल्ली से बातचीत पर आधारित)

 

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